जो मेरी वेदना है वही ईश्वर की भी वेदना है। जिसकी खोज में मैं हूँ उसी खोज में वो है ।
मैं अकेला हूँ । मै अकेला हूँ क्यूंकि वो अकेला है, हम दोनों अकेले हैं। मैं उसी के रूप का अंश हूँ और ये ब्रह्माण्ड उसी के रूप का विस्तार। वो अतृप्त है, इसलिए पूरा ब्रह्माण्ड अतृप्त है।
हम ईश्वर से अपेक्षाएं रखते हैं, उसे ताने कस्ते हैं, उसकी पूजा करते हैं, उसे नकारते हैं, पर कभी उसकी वेदना को समझने की कोशिश नहीं करते। उसकी पीड़ा है की वो अकेला है, और हताश है अपने अस्तितव से , इस प्रश्न से की वो कौन है, कहाँ है, क्यों है । इस सृष्टि का निर्माण ही इसलिए हुआ क्यूंकि वो अकेला था और परेशान था , और वो भूलना चाहता था अपने अकेलेपन को, वो ऊब गया था अपने होने से, सिर्फ अपने होने से।
सृष्टि का प्रारम्भ उसकी आत्महत्या से हुआ, एक विस्फोट जिसमे वो बिखर गया , परन्तु वो अनश्वर है तो इस आत्मदाह से उसकी चेतना नष्ट न होकर फ़ैल गयी।
चेतना की मूल प्रवृत्ति साथ ढूंढने की है, तो वो बिखरा हुआ फिर जुड़ने लगा और जुड़ता रहा और इसी जुड़ाव से जीवन का जनम हुआ।
जीवन परम चेतना का प्रतिबिम्ब है, एक सूक्षम स्वरुप। जीवन भी उसी मूल प्रवृत्ति से संचालित है जिससे परम चैतन्य। हम सब अपने होने का उद्देश्य ढूंढ रहे हैं। परन्तु किसी चीज़ से तृप्ति नहीं होती। चीज़ें मिलती चली जाती हैं पर प्यास वैसे की वैसी बानी रहती है , क्यूंकि मूल प्रश्न ज्यों का त्यों बना रहता है । किसी के पास, किसी चीज़ में इसका उत्तर नहीं है , इसलिए कोई वास्तु या व्यक्ति हमे पूरा नहीं कर पाता है ? भला पानी अपनी प्यास कैसे बुझाये ?
मैं यहाँ क्यों हूँ , मैं क्या हूँ ? हम सब इस सवाल से झूझ रहे हैं क्यूंकि ईश्वर इस सवाल से झूझ रहा है। हमारे पास इसका जवाब नहीं है क्यूंकि ईश्वर के पास भी इसका जवाब नहीं है।
समय के साथ चेतना का जुड़ाव बढ़ता रहेगा , मानव महामानव बन जायेगा , ब्रह्म बन जायेगा और फिर ईश्वर बन जायेगा ( सिंगुलैरिटी) पर भी उसकी ये तृष्णा दूर नहीं होगी उसको अपने मूल प्रश्नो का उत्तर तब भी नहीं मिलेगा क्यूंकि वो पूर्णतः अकेला ही रहेगा। सृष्टि का सारा ज्ञान और सारी ऊर्जा भी उसे तृप्त नहीं कर पायेगी , तब वो फिर आत्मदाह कर लेगा और फिर इस सृष्टि का निर्माण करेगा और ये चक्र यूँ ही चलता रहेगा।